سلام
بسم اللہ الرحمن الرحیم ایک پُرانا طرحی کلام پیشِ خدمت ہے पुराना तरही कलाम حسینیت پہ زمانے نے جب بھی وار کیا دعائے فاطمہ زہرا ع. نے تب حصار کیا हुसैनियत पा ज़माने ने जब भी वार किया दुआए फ़ातेमा ज़हरा स.अ. ने तब हिसार किया। ادا یوں اجرِ رسالت کا حق کیا ہم نے غمِ حسین ع. میں آنکھوں کو اشکبار کیا अदा यूं अज्रे रिसालत का हक़ किया हमने ग़मे हुसैन अ.स. में आँखों को अश्कबार किया। چراغِ اشکِ غمِ شاہ ع. کی قیادت میں پلِ صراط کو پل بھر میں ہم نے پار کیا चराग़े अश्के ग़मे शाह की क़यादत में पुले सिरात को पलभर में हमने पार किया। لبِ فرات قضا آ گئی اُسے فوراً علی ع. کے شیر نے جس پر نظر کا وار کیا लबे फ़ुरात क़ज़ा आ गई उसे फ़ौरन अ़ली के शेर ने जिसपर नज़र का वार किया। خلافِ ماتمِ شبی...