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Showing posts from March, 2020

سلام

باسمہ سبحانہ و تعالٰی  برسرِ دشتِ کرب و بلا موت کا ہم نے دیکھا ہے بجھتا دیا موت کا قاسم ابنِ حسن تم پہ لاکھوں سلام تم نے بتلا دیا ذائقہ موت کا دشتِ غربت میں پیاسوں کی چھوٹی سی فوج ڈھونڈھتی پھر رہی ہے پتہ موت کا دین کو کربلا میں ملی زندگی ظلم کو مل گیا راستہ موت کا رن کو نکلے ہیں اصغر یہی سوچکر آج کر دیںگے ہم  خاتمہ موت کا چہرا حیدر کا دیکھا جو وقتِ نزاع مجھکو آساں لگا مرحلہ موت کا دیکھ کر اصغرِ بے زباں کی ہنسی کلمہ پڑھنے لگا حرملہ موت کا ذکرِ شبیر ہے زندگی کی سند ہم سے ممکن نہیں تذکرہ موت کا جلتی ریتی پہ اصغر نے رگڑے قدم مٹ گیا دیکھئیے نقشِ پا موت کا دار پہ چڑھ کے میثم نے سمجھا دیا مسئلہ موت کا فلسفہ موت کا ہم نے *عارف* کیا جب غمِ کربلا ظلم پڑھنے لگا مرثیہ موت کا سید محمد عسکری عارف

غزل

پرانی غزل عزابِ حُسن تہِ دید میں نہاں کرکے میں جل بجھا کوئی بستی دھواں دھواں کرکے گرِا انا کی بلندی سے جب تو یاد آیا میں جی رہا تھا زمینوں کو آسماں کرکے ترے وجود کا کوئی پتہ نہیں ملتا تلاش ہم تجھے آے کہاں کہاں کرکے گِرا ہوں کتنی دفعہ بامِ سرفرازی سے اٹھا ہوں پھر بھی ارادے جواں جواں کرکے چلا تھا میں تو اکیلا ہی سوئے دشتِ بلا سفر تمام کیا خود کو کارواں کرکے ملا جو کوئی بھی اپنا پرائی بستی میں تو ہم بھی رو پڑے رودادِ غم بیاں کرکے سںنبھل سنبھل کے چلو راہِ خار پر عارف کسی نے پھینکا ہے پھولوں کو بیڑیاں کرکے. محمد عسکری عارف------

غزل

सरों पर ख़ौफ़ का साया बहोत है मिरी बस्ती में  सन्नाटा  बहोत  है। कहाँ तक मौत को झुठलाओगे तुम अजल का फ़ैसला सच्चा बहोत है। जिसे महफ़िल की ज़ीनत जानते हो वो अपने  आप  में  तनहा बहोत है। जो मरने  से  बचा  हो  हादसे में उसे वो एक ही लमहा बहोत है। हो जिसके ख़ून में  ज़िंदाज़मीरी हक़ीक़त में वही ज़िंदा बहोत है। हमेशा जो हंसा करता है आरिफ़ वही तनहाई  में  रोता  बहोत है। असकरी आरिफ़

غزل

ग़ज़ल आख़िर हुदूदे  ज़ात से  आगे  निकल गया ! एक ग़म, ग़मे हयात से आगे निकल गया !! ख़ामोशी अख़्तियार ही करनी पड़ी मुझे ! वो शख़्स मेरी बात से आगे निकल गया !! सूरज तो दिन के साथ ही फिर ढल गया मगर ! क्यों चांद ढलती रात से आगे निकल गया !! डरता था एक बच्चा बिछड़ते जो बाप से ! उंगली छुड़ा के हाथ से,आगे निकल गया !! कल रात तुझको ख़्वाब में देखा तो यूं हुआ ! मै अपनी काएनात से आगे निकल गया !! नाकामियां फिर उसके मुक़द्दर से मिट गई ! जो हद्दे मुमकिनात से आगे निकल गया !! क़ुरआन ओ अहलेबैत का दामन न छोड़ कर ! मै भी पुल ए सिरात से आगे निकल गया !! पानी को जाम ए तिशना दहानी पिला के कौन ! मुंह फेर कर फ़ुरात से आगे निकल गया !! दुशवार रह गुज़र थी बड़ी  ज़ीस्त की मगर ! आरिफ़ भी तजरबात से आगे निकल गया !! (असकरी आरिफ़)

منقبت امام حسین علیہ السلام

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غزل

پرانی غزل   पुरानी ग़ज़ल कोई तदबीर करो रास्ता हासिल निकले कारवां होके रवां जानिबे मंज़िल निकले। کوئی تدبیر کرو راستہ حاصل نکلے کارواں ہوکے رواں جانبِ منزل نکلے अब तो ये क़ल्ब की दौलत मिरी बेकार हुई मार दे नैज़ा कि सीने से मिरा दिल निकले। اب تو یہ قلب کی دولت مری بیکار ہوئی مار دے نیزہ کی سینے سے مرا دل نکلے सोचते  थे   कि  फ़िदा   जान   करेंगे   उनपर हाए अफ़सोस वही ख़ुद मिरे क़ातिल निकले। سوچتے تھے کہ فدا جان کریں گے اُن پر ہاے افسوس وہی خود مرے قاتل نکلے हम तो बेलोस वफ़ा  अपनी निभाते ही रहे बेवफ़ाई के शिगूफ़ों में वो कामिल निकले।  ہم تو بے لوث وفا اپنی نبھاتے ہی رہے  بے وفائی کے شگوفوں میں وہ کامل نکلے कैसा ये वक़्त पड़ा मुझपा कि अब मेरे हरीफ़ मिरे  हमराह   मिरे दर्द  में   शामिल   निकले। کیسا یہ وقت پڑا مجھ پہ کہ اب میرے حریف مرے ہمراہ مرے درد میں شامل نکلے तू कोई मंतिक़ ओ साइंस ओ रियाज़ी तो नहीं क्यों तिरे इश्क़ में फिर इतने मसाइल निकले? تو کوئی منطق و سائنس و ریاضی تو ن...

غزل

پرانی غزل   पुरानी ग़ज़ल कोई तदबीर करो रास्ता हासिल निकले कारवां होके रवां जानिबे मंज़िल निकले। کوئی تدبیر کرو راستہ حاصل نکلے کارواں ہوکے رواں جانبِ منزل نکلے अब तो ये क़ल्ब की दौलत मिरी बेकार हुई मार दे नैज़ा कि सीने से मिरा दिल निकले। اب تو یہ قلب کی دولت مری بیکار ہوئی مار دے نیزہ کی سینے سے مرا دل نکلے सोचते  थे   कि  फ़िदा   जान   करेंगे   उनपर हाए अफ़सोस वही ख़ुद मिरे क़ातिल निकले। سوچتے تھے کہ فدا جان کریں گے اُن پر ہاے افسوس وہی خود مرے قاتل نکلے हम तो बेलोस वफ़ा  अपनी निभाते ही रहे बेवफ़ाई के शिगूफ़ों में वो कामिल निकले।  ہم تو بے لوث وفا اپنی نبھاتے ہی رہے  بے وفائی کے شگوفوں میں وہ کامل نکلے कैसा ये वक़्त पड़ा मुझपा कि अब मेरे हरीफ़ मिरे  हमराह   मिरे दर्द  में   शामिल   निकले। کیسا یہ وقت پڑا مجھ پہ کہ اب میرے حریف مرے ہمراہ مرے درد میں شامل نکلے तू कोई मंतिक़ ओ साइंस ओ रियाज़ी तो नहीं क्यों तिरे इश्क़ में फिर इतने मसाइल निकले? تو کوئی منطق و سائنس و ریاضی تو ن...