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Showing posts from April, 2020

غزل

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غزل

ग़ज़ल यूं ज़िंदगी में मिलते हैं कुछ अजनबी से लोग बनते हैं कुछ ही रोज़ में वो  ज़िंदगी से लोग। करने लगे हैं   इश्क़   अ़जब  तीरगी से लोग ये क्या हुआ कि जलने लगे रोशनी से लोग।।  मिलते  थे  पहले हंस  के  मिरे  हाले   ज़ार  पर मिलते हैं अब वो मुझसे फ़सुरदा दिली से लोग।।  महशर के   कुछ  अभी   तो   ये आसार   भी नहीं फिर क्यों हैं इतना  मौत से ख़ाइफ़ अभी से लोग।।  ढूंढा तो  हमने  ख़ूब  कि   इंसा   कोई   मिले लेकिन जहाँ  मिले तो मिले आदमी से लोग।।  चेहरे  अलग, ज़बान  अलग, रंग  भी  अलग फिर क्यों मुझे ये लोग लगे एक ही से लोग।।  फिरता है सर  जो  हाथों  में अपना लिए हुए फिर जान मांग बैठे हैं आ़रिफ़ उसी से लोग।।  असकरी आरिफ़

بشر کی بات ہی کیا ہے کہ پتھر مسکراتے ہیں

بسم اللہ الرحمن الرحیم بشر کی بات ہی کیا ہے کہ پتھر مسکراتے ہیں علی ع کے عشق میں دیوار اور در مسکراتے ہیں  نبی ص. کو دیکھ کے حیدر برابر مسکراتے ہیں علی ع کا دیکھکر چہرہ پیمبر مسکراتے ہیں جہاد بالنفس بھی دیکھے زمانہ جنگِ خندق میں عدو کے سینے سے حیدر اُترکر مسکراتے ہیں مرے مالک بنی ہاشم کے بچے کیا بہادر ہیں بلا کی پیاس میں جو تیر کھاکر مسکراتے ہیں شکستِ ظلم اب اِس سے سوا ہو ہی نہیں سکتی گلے پہ تیر کھاکے ننہے اصغر ع. مسکراتے ہیں ہزاروں سختیاں قرباں سفر کی اِس تبسّم پر کہ عابد ع. حرملہ کا دیکھ کے سر مسکراتے ہیں جو حُر ع. بن نے کی ہمت ہے، گنہگاروں چلے آؤ درِ شبیر ع. پر آکر مقدر مسکراتے ہیں اگر ہوتی نہ تشہیر حرم، شاہد جہاں ہوتا سناں کی نوک پر کیسے بہتر مسکراتے ہیں عسکری عارف

سلام

بسم اللہ الرحمن الرحیم  ایک پُرانا طرحی کلام پیشِ خدمت ہے पुराना तरही कलाम  حسینیت پہ زمانے نے جب بھی وار کیا دعائے فاطمہ  زہرا ع.  نے تب حصار کیا हुसैनियत   पा   ज़माने  ने   जब   भी  वार   किया दुआए फ़ातेमा ज़हरा स.अ. ने तब  हिसार  किया। ادا یوں اجرِ رسالت کا حق کیا ہم نے غمِ حسین ع. میں آنکھوں کو اشکبار کیا अदा यूं अज्रे  रिसालत  का   हक़   किया हमने ग़मे हुसैन अ.स. में आँखों को अश्कबार किया। چراغِ اشکِ غمِ شاہ ع. کی قیادت میں پلِ صراط کو پل بھر میں ہم نے پار کیا चराग़े  अश्के   ग़मे   शाह   की  क़यादत में पुले सिरात को पलभर में हमने पार किया। لبِ  فرات   قضا   آ   گئی   اُسے    فوراً علی ع. کے شیر نے جس پر نظر کا وار کیا लबे  फ़ुरात   क़ज़ा   आ   गई    उसे   फ़ौरन अ़ली के शेर ने जिसपर नज़र का वार किया। خلافِ ماتمِ شبی...

یہ سچ ہے کہ ہے منزلتِ عرشِ بریں اور

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Manqabat Hazrat Abu Talib a.s.

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منقبت شہزادہء علی اکبر علیہ السلام

विलादते पुरनूर शहज़ादए अली अकबर अ.स. तमाम मोमनीन की ख़िदमत में दिल की गहराईयों से मुबारक हो। नाम बादे किबरिया आता अली अकबर अ.स. का है सोच कितना मरतबा आ़ला अ़ली अकबर का है। ज़ुल्म की बरछी को बढ़कर तोड़ देने के लिए आज भी हाज़िर वही सीना अ़ली अकबर अ.स. का है। हुस्ने अकबर अ.स. बिक नहीं सकता किसी बाज़ार में हुस्ने अहमद स. हुस्न शहज़ादा अ़ली अकबर अ.स. का है। देख ले दुनिया फ़ुनूने जंगे अहमद स. इसलिए पेशे हक़ तालिब मेरा मौला अ.स. अली अकबर अ.स. का है। अपने आंगन में टहलता है जो शब लैला का चांद हसरतों से चांद रुख़ तकता अ़ली अकबर अ.स. का है। हश्र तक ज़िंदा रहेगा हज़रते अकबर अ.स. का नाम नाम अज़ानों में सदा आता अली अकबर अ.स. का है। सरज़मीने करबला जागीर अ़ली अकबर अ.स. की है मालिकाना हक़ भी ये तन्हा अ़ली अकबर अ.स. का है। चूमती हैं आयतें बढ़ बढ़ के दहने पाक को इस क़दर लहजा फ़सीहाना अ़ली अकबर अ.स. का है। अ़ज़मते वल्लैल क़ुरबां गेसुए ख़मदार पर जलवाहाए वलक़मर चेहरा अ़ली अकबर अ.स. का है। रन में गूंज उठ्ठी सदाए अल हफ़ीज़ो अल अ़मान शाम की फ़ौजों पा यूँ हमला अ़ली अकबर अ.स. का है। फ़क़ न पड़ जाए कहीं सूरज का च...

منقبت جناب سکینہ ص

باسمہ سبحانہ بالکل تازہ کلام ہوں کیسے رقم شان میں اشعار سکینہ قاصر ہیں ترے واسطے افکار سکینہ اسلام کی گردن پہ حسیں ہار سکینہ ہے فرقِ شریعت کی بھی دستار سکینہ پھر خاک ہوئی سطوتِ شاہی سر دربار چمکی جو ترے خطبوں کی تلوار سکینہ اس بات کا شاہد ہے ترا روضہء اطہر تو جیت گئی ظلم گیا ہار سکینہ تو چاہے تو بس ایک اشارے میں الٹ دے یہ تخت ستم، شام کا دربار سکینہ ہیں بازوئے شبیر  علمدارِ وفادار اور بازوئے عباسِ علمدار سکینہ اک ہم ہی نہیں نبیوں اماموں نے پکارا مشکل میں ترا نام کئی بار سکینہ زندہ تو بظاہر تھا مگر مر گیا حاکم یوں لفظ ترے بن گئے تلوار سکینہ ممکن نہیں اب ثانی سکینہ کا جہاں میں ہے خالق اکبر کی وہ شہکار سکینہ اللہ رے یہ کمسنی اور اُس پہ مظالم ہے ثانیء زہرا کی سزاوار سکینہ *عسکری عارف* اکبرپوری

منقبت حضرت علی اصغر علیہ السلام

اسلئے سارے زمانے سے جدا ہے اصغر (ع) بخدا ملکِ تبسّم کا خدا ہے اصغر (ع) مل گیا خاک میں سب طالبِ بیعت کا غرور لشکرِ شام پہ کچھ ایسے ہنسا ہے اصغر (ع) صرف چھ ماہ کے سن میں وہ بڑا کام کیا محوِ حیرت ہے جہاں آج بھی کیا ہے اصغر (ع) چشمِ تاریخ میں رکھے ہیں سمندر جسنے ہاں وہی پیاسہ سرِ کرب و بلا ہے اصغر (ع) جس نے گہوارے میں تھا کلہ اژدر چیرا اُسی مولود کے پیکر میں ڈھلا ہے اصغر (ع) تو تو شبیر (ع) کے قدموں پہ گیا مقتل میں دیں مگر تیرے ہی قدموں پہ کھڑا ہے اصغر (ع) تیرا جھولا بھی ہے شبیر (ع) کے جھولے کی مثال تو بھی ماؤں کو پسر بانٹ رہا ہے اصغر (ع) نہ تبر تیر نہ تلوار نہ خنجر نیزہ تری مسکان ہی دشمن کو قضا ہے اصغر (ع) جنگ کربل میں یہ اعزاز فقط تجھکو ملا بن لڑے ہی تو وغا جیت گیا ہے اصغر (ع)