सहाबी कौन
जो भी थे मुहम्मद के वफ़ादार सहाबा बातिल से रहे बरसरे पैकार सहाबा क़ुरआन ओ शरीयत के तरफ़दार सहाबा इस्लाम पा मर मिटने को तैय्यार सहाबा डरकर न कभी बारिशे पैकान से भागे सर कट गये लेकिन न वो मैदान से भागे। तौहीन जो करता रहा अहमद के वसी की तस्लीम न कि जिसने इमामत भी अ़ली की ताज़ीम न की जिसने कभी बिन्ते नबी की तहक़ीर जो करता रहा ख़ालिक़ के वली की उस पर तो तबर्रा किये बिन रह नहीं सकता ऐसे को सहाबी मैं कभी कह नहीं सकता। हुज्र इब्ने अ़दी, हज़रते सलमान ओ अबुज़र मीसम हों कि मिक़दाद हों कि मालिक ए अशतर नाफ़े हो कि अम्मार, हुज़ैफ़ा हों या क़मबर असहाब थे सब इश्क़ वफ़ा अ़ज़्म के पैकर बातिल से रहे...